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सोमवार, 24 अगस्त 2026

cultural News Varanasi Uttar Pradesh 24 August 2026: Tameer Foundation का एक शाम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम Mushayra

मुशायरों से आजादी के आंदोलन में पैदा की जाती थी जागरूकता और राष्ट्रीय चेतना- इतिहासकार डा. आरिफ

जिसकी क़ुर्बानी से आज़ाद हुआ अपना वतन, आज उस क़ौम को ग़द्दार कहा जाता है...समर ग़ाज़ीपुरी





dil india live (Varanasi). साहित्यिक एवं सामाजिक संस्था तामीर फ़ाउंडेशन के तत्वावधान में आज़ादी के 80 वें जश्न के अवसर पर भेलूपुर स्थित ब्राइट एजुकेशनल क्लासेज़ में मुशायरा “एक शाम मुजाहिदीन-ए-आज़ादी के नाम।” का आयोजन किया गया। 

मुशायरे की अध्यक्षता मशहूर शायर आलम बनारसी ने किया तो चंदौली डायट के उर्दू लेक्चरर डॉ. अज़हर सईद ने अपने शानदार निजामत कर लोगों को देर तक बांधे रखा। मुख्य अतिथि व विशिष्ट अतिथियों में डॉ. मुहम्मद आरिफ़, अतीक़ अंसारी, प्रो. शम्स अज़ीज़, हाजी इश्तियाक़ अहमद और राजनीतिक हस्ती अतहर जमाल लारी उपस्थित थे।

कार्यक्रम के आरंभ में तामीर फ़ाउंडेशन के सक्रिय पदाधिकारियों अफ़शा रोमानी, डॉ. अज़हर सईद, शफ़ाअत अली और क़सीमुद्दीन क़सीम ने अतिथियों तथा शायरों का गुलपोशी और शाल ओढ़ाकर स्वागत किया। मुशायरे का आगाज़ रसूल-ए-अकरम की नात से नातख़्वां ओवैस चंदौलवी ने किया।

मुख्य अतिथि डॉ. मुहम्मद आरिफ़ ने मुशायरे की परंपरा को स्वतंत्रता आंदोलन की सांस्कृतिक चेतना से जोड़ते हुए कहा कि मुशायरा केवल कविता सुनने-सुनाने की महफ़िल नहीं रहा है। अंग्रेज़ी शासन के दौर में जब सार्वजनिक सभाओं और प्रदर्शनों पर अनेक प्रकार की पाबंदियां थीं, तब शायरी और साहित्यिक बैठकों के माध्यम से लोगों में जागरूकता और राष्ट्रीय चेतना पैदा की जाती थी। उन्होंने कहा कि आज़ादी किसी सहज उपलब्धि का नाम नहीं, बल्कि अनगिनत त्याग और कुर्बानियों का परिणाम है। इसलिए उसकी रक्षा करना भी हम सबकी साझा ज़िम्मेदारी है। स्वतंत्रता आंदोलन में मुसलमानों की भागीदारी और कुर्बानियों को भी इतिहास के उसी निष्पक्ष और व्यापक संदर्भ में याद किया जाना चाहिए, जिसमें देश के दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान दर्ज है।

अतहर जमाल लारी ने कहा कि नई पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन के वास्तविक इतिहास से परिचित कराना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक है। इतिहास की सार्थकता तभी बनी रहती है, जब उसमें हर समुदाय, वर्ग और व्यक्ति के योगदान को न्यायपूर्ण ढंग से स्थान मिले।


मुशायरे में अध्यक्षता कर रहे आलम बनारसी ने पढ़ा—

नफ़रतों की हरारतें कब तक,

एक न एक दिन बुख़ार निकलेगा।

ज़मज़म रामनगरी ने सुनाया,

लहद में मां की तरह मुझको भींच लेती है,

हमारा रिश्ता अज़ल से है इस ज़मीन के साथ।

ज़िया अहसनी ने पढ़ा कि,

जो उस्वा-ए-यूसुफ़ पे रहा करते हैं क़ायम

वो क़ैद-ए-ज़ुलेख़ा की शिकायत नहीं करते।

डॉ. शाद मशरिक़ी ने पढ़ा,

मिल तो जाएंगे जानने वाले

दूसरा शाद ला न पाओगे।

समर ग़ाज़ीपुरी ने सुनाया,

जिसकी क़ुर्बानी से आज़ाद हुआ अपना वतन,

आज उस क़ौम को ग़द्दार कहा जाता है।

रोशन अहमद रोशन ने कहा,

है कितना अरज़ां ये ख़ून-ए-इंसाँ का,

कि क़त्ल-ओ-ग़ारत गली-गली है।

अज़फ़र बनारसी ने कहा,

दिखावा हम नहीं करते वतनपरस्ती का,

वतनपरस्त हथेली पे जान रखते हैं।

निज़ाम बनारसी ने कहा कि,

झंडा वतन का मर के भी झुकने नहीं दिया,

बिस्मिल्लाह का ये हमीद का हिंदुस्तान है।

शारिक़ फूलपुरी ने कहा—

चराग़ हमने जलाए हैं आदमियत के,

ये अँधेरों से न देखा गया तो क्या होगा।

अबू शहमा का स्वर था—

कोई कह दे ज़रा जा के अग़यार से,

थक के बैठा नहीं हूँ अभी हार के।

जबकि अब्दुर्रहमान नूरी ने पढ़ा,

आज हम बैठ के बस इश्क़ की बातें कर लें,

ये सियासत, ये नज़रियात अभी रहने दें।


इन शायरों के अतिरिक्त डॉ. बख़्तियार नवाज़, आशिक़ बनारसी, अनिल प्रोक़्ता, आकाश मिश्रा, रेशमा खातून, शफ़ाअत अली, ज़ाहिद अल्फ़ाज़ और क़सीमुद्दीन क़सीम ने भी अपना कलाम प्रस्तुत किया, जिसे मौजूद लोगों ने पूरे दिल से न सिर्फ सुना बल्कि पसंद भी किया और सराहा भी।

मुशायरे में शहर के साहित्यप्रेमी और गणमान्य नागरिक भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। डॉ.एहतेशामुल हक़, शमीम रियाज़, मोहम्मद शाहिद, आगा निहाल, इश्तियाक़ अहमद, अब्दुल्लाह बिन ग़फ़्फ़ार, शकील पंजाबी और अहमद इक़बाल आदि मौजूद थे।

इस अवसर पर मेज़बान उस्ताद-ए-शोअरा मुस्लिम अल-हरीरी के पौत्र इफ़्तिख़ार ने शुक्रिया अदा करते हुए अपने बुज़ुर्ग की पुस्तक इस्लामनामा से ‘तूफ़ान-ए-नूह’ के कुछ अंश भी सुनाए। अंत में तामीर फ़ाउंडेशन की उपाध्यक्ष अफ़शा रोमानी ने मुशायरे की सफलता के लिए सभी मेहमानों, शायरों का आभार व्यक्त किया।

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