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रविवार, 22 मार्च 2026

Eid Mubarak 2-eid के बाद शुरू हुआ असल इम्तिहान

जरा गौर कीजिए क्या रमज़ान हमें बदल पाया?

इस्लाम में इबादत का मकसद केवल रस्म नहीं, बल्कि बेहतर इंसान बनाना



dil india live (Varanasi). रमज़ान के मुकम्मल होने और ईद-उल-फितर की नमाज़ के साथ एक पाक महीने का समापन हो जाता है। मस्जिदों और ईदगाहों में तकबीर की गूंज, गले मिलने की रिवायत और खुशियों का माहौल...ये सब मिलकर एक रूहानी सुकून देते हैं। लेकिन इस खुशी के पीछे एक गहरी सच्चाई छिपी है: असली इम्तिहान अब शुरू होता है। रमज़ान तो एक ट्रेनिंग था, एक अभ्यास था, अब देखना यह है कि इस प्रशिक्षण का असर हमारे जीवन में कितना स्थायी हुआ।

रमज़ान के 30 दिनों में इंसान खुद को एक अनुशासन में बांध लेता है। वह न सिर्फ भूख-प्यास से सब्र करना सीखता है, बल्कि अपनी नजर, जुबान और दिल को भी काबू में रखने की कोशिश करता है। पांच वक्त की नमाज़ की पाबंदी, कुरआन की तिलावत, गुनाहों से दूरी और जरूरतमंदों की मदद—ये सब उस महीने की पहचान बन जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब केवल एक महीने के लिए था? अगर ईद के बाद हम फिर से उसी लापरवाही, गुस्से, झूठ और बेईमानी की तरफ लौट जाते हैं, तो यह इस बात का संकेत है कि हमने रमज़ान को केवल निभाया, समझा नहीं।



ईद के बाद की जिंदगी दरअसल हमारे ईमान की असली परीक्षा होती है। अब कोई रोजे की मजबूरी नहीं, कोई समय की सख्ती नहीं बल्कि अब हर अच्छा काम हमारी अपनी नीयत और इरादे पर निर्भर करता है। यही वह समय है जब यह तय होता है कि हमने सब्र को अपनी आदत बनाया या केवल एक महीने का अभ्यास समझकर छोड़ दिया। क्या हम अपनी नमाज़ों को वैसे ही कायम रखेंगे? क्या हमारी जुबान झूठ और गाली से बची रहेगी? क्या हमारी नजरें वैसी ही पाक रहेंगी जैसी रमज़ान में थीं?

यह भी समझना जरूरी है कि इस्लाम में इबादत का मकसद केवल रस्म निभाना नहीं, बल्कि इंसान को बेहतर बनाना है। अगर रमज़ान के बाद भी हमारे व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आता, तो यह आत्ममंथन का विषय है। हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हमने केवल भूख-प्यास सही या अपने अंदर के अहंकार, लालच और बुराइयों को भी काबू किया?

असल सुधार वहीं है जो स्थायी हो। अगर हम रमज़ान की सीखी हुई बातों को अगले 11 महीनों में भी जारी रखें—चाहे वह नमाज़ की पाबंदी हो, सच्चाई हो, या दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार तो यही इस महीने की असली कामयाबी होगी। वरना, हर साल रमज़ान आएगा और चला जाएगा, लेकिन हम वहीं के वहीं रह जाएंगे।

ईद केवल खुशी का दिन नहीं, बल्कि एक याद दिलाने वाला दिन भी है कि हमने एक महीने तक जो सीखा, उसे अब अपनी पूरी जिंदगी में उतारना है। क्योंकि अल्लाह के यहां असली मायने उसी के हैं, जो लगातार रहे, न कि जो केवल एक महीने तक सीमित हो।

हेसामुद्दीन अंसारी 

(लेखक पत्रकार व विचारक हैं)


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