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बुधवार, 11 मार्च 2026

Ramadan ka Paigham 20: शब-ए-कद्र पर सहर तक हुई इबादत

हज़ार रातों में अफज़ल है शबे कद्र की एक रात



Varanasi (dil India live)। शब-ए-कद्र पर रोज़ादारों ने पूरी रात जागकर इबादत की, इसके बाद सहरी किया और फजर की नमाज अदा करके तीसरे अशरे का पहला रोजा रखा। इस मौके पर तसबीर, कुरान की तेलावत और नफिल नमाजों की कसरत की गई।

शब-ए-कद्र की अहमियत

 रमज़ान महीने की इबादतों में शब-ए-कद्र की अहमियत बहुत ज्यादा है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि रब फरमाता है कि रमज़ान के मुक़द्दस महीने के आखिरी अशरे के दस दिनों में पांच रातें ऐसी होती हैं जिन्हें शब-ए-कद्र या ताक रातें कहा जाता है। ये हैं रमज़ान की 21, 23, 25, 27 व 29 वीं की शब। इममें से कोई एक शब-ए-कद्र की रात होती है। यह रात हजार महीनों से बेहतर मानी जाती है। यही वजह है कि इन पांचों रातों में मुस्लिम मस्जिदों व घरों में अल्लाह की कसरत से इबादत करते हैं। यही वजह है कि मर्द ही नही महिलाएं और बच्चे भी घरों में रात जागकर इबादत करते दिखाई देते हैं। उलेमा कहते हैं कि रब कहता है कि तुम्हारे लिए एक महीना रमजान का है, जिसमें एक रात है जो हजार महीनों से अफजल है। उस रात का नाम शबे कद्र है। यानी यह कद्र वाली रात है कि जो शख्स इस रात से महरूम रह गया वो भलाई और खैर से दूर रह गया। जो शख्स इस रात में जागकर ईमान और सवाब की नीयत से इबादत करता है तो उसके पिछले सभी गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। यह रात बड़ी बरकतों वाली रात होती है। इस रात को मांगी गई दुआ हर हाल में रब कुबूल करता है। दरअसल रब का आफर केवल रमज़ान महीने में ज्यादा रहता है वो इसलिए भी की यह महीना अल्लाह का महीना है जिसके शुरू होते ही शैतान गिरफ्तार कर लिया जाता है और जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं, जहन्नुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। या अल्लाह रब्बुल इज्ज़त तू अपने हबीब के सदके में हम सबको रमज़ान की इबादतों और नेमतों से मालामाल कर और हमारी नेक दुआएं कुबुल कर ले... आमीन।

मौलाना अमरुलहोदा
( प्रमुख मुस्लिम उलेमा, मिल्कीपुर)