} .post h1, .post-title, .post-title a { color: #CC0000 !important; } .post h2 { color: #222222 !important; border-left: 4px solid #CC0000 !important; padding-left: 8px !important; } .post h3, .post h4 { color: #222222 !important; } }

ब्रेकिंग न्यूज

ब्रेकिंग न्यूज़
🔴 मध्य प्रदेश के देवास में खातेगांव थाना प्रभारी दिलीप पुरी को शराब से भरे ट्रक ने कुचला, मौत । 🔴 सेंट मैरीज़ कांवेंट स्कूल कैंटोनमेंट में क्लास 6 से 8 तक के लिए स्कूल के कपाट खुले, तेंदुआ अब भी पकड़ से बाहर। 🔴 भारतीय वायुसेना के 29 वें चीफ बने आशुतोष दिक्षित, पदभार संभाला।। 🔴 नीता अंबानी ने किया 'नीता मुकेश अंबानी अनंत आश्रय' का भूमिपूजन, 5,000 से अधिक जरूरतमंदों को मिलेगा अपना घर। 🔴 कल 3 नवंबर को वाराणसी में होगा सपा प्रमुख व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का आगमन। 🔴 वाराणसी के मौसम में बदलाव, सुबह सुबह दिखी ठंड के साथ कोहरे की चादर। दिलचस्प खबरों के आप हमारे साथ बनें रहें dil india live news portal

सोमवार, 1 अगस्त 2022

Munshi Prem Chandra:साहित्यकार महाभारत काल के बर्बरीक की भांति

मुंशी प्रेमचंद, डॉ. उमाशंकर तिवारी की जयन्ती 
Ghazipur (dil india live). शहर के अष्टभुजी कॉलोनी स्थित द प्रेसिदियम इंटरनेशनल स्कूल के सभागार में साहित्य चेतना समाज और अखिल भारतीय हिन्दी महासभा ने मुंशी प्रेमचंद और डॉ उमाशंकर तिवारी की जयन्ती का आयोजन किया। संस्था के संस्थापक अमरनाथ तिवारी ने सभी आगन्तुक साहित्यसेवियों का स्वागत करते हुए मुंशी प्रेमचन्द और डॉ उमाशंकर तिवारी को नमन किया। कार्यक्रम का आरम्भ दीप प्रज्ज्वलन, माल्यार्पण और पुष्पार्चन से हुआ।

आधार वक्तव्य रखते हुए माधव कृष्ण ने कहा कि, साहित्यकार महाभारत काल के बर्बरीक की भांति होता है। साहित्यकार की वैयक्तिकता मरती है तो वह समग्रता विकसित करता है और तटस्थ रूप से घटनाओं का निरीक्षण कर साहित्य रचता है। मुंशी प्रेमचंद कालजयी इसलिए हैं क्योंकि उस कालखण्ड की कोई भी घटना उनकी पैनी दृष्टि से बच नहीं पायी। इस्लामिक कट्टरता पर ‘दिल की रानी’ इसका एक उदाहरण है। डॉ उमाशंकर तिवारी का साहित्यिक अवदान यही है कि जब साठ के दशक के बाद गीत लिखना पिछडापन माना जाने लगा, उन्होंने यथार्थवादी गीतों की रचना की जो आज भी लोग गुनगुनाते हैं।

मुख्य वक्ता डॉ रामनारायण तिवारी ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद का साहित्य पूरे भारत का प्रतिनिधित्व नहीं करता क्योंकि उन्होंने अधिकांशतः नगरीय विसंगतियों का वर्णन किया है जबकि उस समय अस्सी प्रतिशत से ऊपर जनसंख्या गाँव में रहती थी। उन्हें आलोचकों ने गढ़ा है, पढ़ा नहीं। उन्होंने नवगीतकार डॉ उमाशंकर तिवारी को संवेदना पर खड़ा साहित्यकार बताया और यही उनकी विशिष्ट पहचान है। उन्होंने दोनों साहित्यकारों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए कहा कि, तिवारी जी लोक को समझ पाए लेकिन मुंशी प्रेमचंद की लोकधर्मिता संदिग्ध है। उन्होंने आज के साहित्यकारों को अधिक से अधिक लोक के जुड़कर उसे समझने पर बल दिया।

विशिष्ट वक्ता डॉ श्रीकांत पाण्डेय ने मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को विस्तृत बताया और कहा कि, वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। प्रेमचंद की रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। उन्होंने उमाशंकर तिवारी जी को अत्यधिक संवेदनशील गीतकार बताया जिसके अपने अनूठे जीवन संघर्ष थे, जो प्राचार्यत्व को बोझ मानते थे और गीतधर्म को मुक्ति।

विशिष्ट वक्ता डॉ व्यासमुनी राय ने मुंशी प्रेमचंद के इस वक्तव्य उद्धृत किया - साहित्य के भावों की जो उच्चता, भाषा की प्रौढ़ता और स्पष्टता, सुन्दरता की जो साधना होती है, वह हमें सिनेमा में नहीं मिलती। और कहा कि, एक अध्ययनशील वातावरण की आवश्यकता है। उन्होंने डॉ उमाशंकर तिवारी के पुराने दिनों को स्मरण किया और बताया कि राजकीय सिटी इंटर कॉलेज में कक्षा ६ से ही वह प्रेयर बॉय बन गए थे और उन्हें कोकिल उपनाम से बुलाया जाता था।

कथाकार गजाधर शर्मा गंगेश जी ने प्रेमचन्द हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। विषमताओं भरे जीवन में हंसोड़ होना एक बहादुर का काम है। इससे इस बात को भी समझा जा सकता है कि वह अपूर्व जीवनी-शक्ति का द्योतक थे। सरलता, सौजन्य और उदारता की वह मूर्ति थे। जहाँ उनके हृदय में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में ग़रीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति का अथाह सागर था। प्रेमचन्द उच्चकोटि के मानव थे। उन्होंने डॉ मशंक्र तिवारी से अपनी निकटताओं पर बात करते हुए कहा कि, उनके जाने के बाद गाजीपुर में काव्य गोष्ठियों की सक्रियताएं कम हो गयीं। ऐसे महापुरुषों को याद करने मात्र से हिन्दी साहित्य गतिशील हो उठता है। 

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में विश्वविमोहन शर्मा ने डॉ उमाशंकर तिवारी के गीत “वे लोग जो काँधे हल ढोते/खेतों में आँसू बोते हैं-/उनका ही हक़ है फ़सलों पर/अब भी मानो तो/बेहतर है।” का वाचन किया और मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को अमर बताया।

डॉ राकेश पाण्डेय जी ने मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में स्वजातीय लोगों को खलनायक न दिखाने पर प्रश्न खड़ा किया; और साथ ही कहा कि उनकी कहानियों में इस्लामिक आतंकवाद इत्यादि देखना ठीक नहीं। डॉ इन्दीवर रत्न पाठक ने राम अवतार सिंह भीखा जी द्वारा रचित गीत “भारत भूमि सुहावन देव मनभावन हो/भईया दुनिया में नाहीं अइसन माटी, न पानी अइसन पावन हो।” सुनकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कवयित्री पूजा राय जी ने “हमारे भीतर उपस्थित है प्रेम का शोर” का काव्य पाठ किया और वंचितों पीड़ितों को और अधिक प्रेम करने की आवश्यकता पर बल दिया। कवयित्री अनुश्री ने ऑनर किलिंग पर कविता “मौलिक अधिकारों वाले पन्नों को/चाट चुके थे दीमक” प्रस्तुत की और लोगों को सोचने पर विवश किया।

डॉ निरंजन यादव ने संचालन करते हुए श्रोताओं को बांधे रखा और वातावरण जीवंत बनाया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ शिखा तिवारी ने किया और कहा कि, दोनों साहित्यकारों का जन्मदिन एक साथ है फिर भी उनमें तुलनात्मक अध्ययन ठीक नहीं। दोनों का कालखंड अलग-अलग है और दोनों की विधा भी अलग है। मुंशी प्रेमचंद जहां युगों युगों तक अपने कथा के लिए याद किये जायेंगे वहीं डॉ उमाशंकर तिवारी अपनी संवेदना और हिंदी साहित्य में नवगीत के प्रस्थान बिंदु के रूप में याद किये जायेंगे। सभा में प्रभाकर त्रिपाठी, हरीश पाण्डेय, सहेंद्र यादव, सज्जन जायसवाल इत्यादि उपस्थित थे।

कोई टिप्पणी नहीं: