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शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

कर्बला के शहीदों की याद में निकला जुलूस

गमे हुसैन के आखिरी साठे के जुलूस में हुआ मातम

 वाराणसी 15 अक्टूबर(न्यूज दिल इंडिया लाइव)। गमे हुसैन के अन्तिम दिन और शिया वर्ग के 11वें इमाम हजरत हसन असकरी की शहादत पर शुक्रवार को साठे का जुलूस निकाला गया। इसी के साथ ग़म का दो माह आठ दिन का अय्याम पूरा हो गया।


या हुसैन की दर्द भरी सदाओं के बीच पुरानी अदालत दालमंडी में स्थित शब्बीर और सफदर के अजाखाने से निकले जुलूस में शहीदाने कर्बला को आंसुओं का नजराना पेश किया गया। जुलूस में शामिल अलम, दुलदुल, तुरबत और अमारी की जियारत की गई और लोगों ने मन्नतें उतारीं। रास्ते भर अंजुमन हैदरी के दर्द भरे नौहें अकीदतमंदों की आंखें नम करते रहे। जुलूस नई सड़क काली महल पहुंचा तो यहां सैकड़ों की तादाद में मौजूद मर्द, ख्वातीन, बुजुर्ग, नौजवान, बच्चे और बच्चियों ने अमारी का इस्तकबाल किया। यहां से जुलूस अपने कदीमी रास्तों से होता हुआ और शासन के गाइडलाइन के अनुसार नौहा और मातम करता हुआ दरगाहे फातमान पहुंचा। जहां अलविदाई मजलिस हुई। इससे पूर्व हुईं मजलिसों में कर्बला की शहादत के मंजर को बताया गया।

साठे का जुलूस उठने से पहले मजलिस को खेताब करते हुए लखनऊ से आए मौलाना इरशाद अब्बास नक़वी ने बताया कि इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों जिसमें एक छह माह का बच्चा भी था। सबको तीन दिन का भूखा और प्यासा शहीद करने के बाद उस वक्त के दुर्दांत बादशाह और वक्त के पहले आतंकवादी यजीद के हुक्म पर उनकी औरतों, बच्चों और बीमार बेटे को पैदल करबला से कूफा और कूफा से शाम तक पैदल अजियत (यातनाए) देते हुए ले जाया गया। यज़ीदी फ़ौज ने बच्चों और औरते के गले एक रस्सी से बांध दिए थे। यदि औरतें उठती थीं तो बच्चों का गला कसने लगता था और वो दर्द से तड़प उठते थे। बच्चों को दर्द से बचाने के लिए इमाम के घर की औरतों ने 3590 किलोमीटर का सफर कमर को झुकाकर किया। यही नहीं यदि कोई औरत या बच्चा चलते चलते रुक जाता था तो उसे कोड़ों से मारा जाता था। 

मौलाना की ये तकरीर सुन वहां मौजूद शिया समुदाय की महिलाएं और पुरूष बिलख पड़े। मौलाना ने बताया कि इमाम हुसैन और उनके साथियों को सिर्फ इसलिये शहीद कर दिया गया क्योंकि इमाम हुसैन ने अपने नाना पैगंबर साहब के दीन को बचाने के लिए यजीद की शर्तों पर अपनी हामी नहीं दी थी। शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी फरमान हैदर ने बताया कि आज इमाम हसन असकरी की शहादत पर ताबूत भी उठाया गया। आखिर में असकरी रज़ा सईद ने शुक्रिया अदा किया।

यौमुन्नबी वीक में मनेगी खुशी

दो महीने आठ दिन, गम के दिन पूरे होने पर शनिवार को शिया हजरात खुशी मनाएंगे। गमों का लिबास उतारकर खुशियों के नए लिबास ओढ़ेंगे। घरों में पकवान बनेंगे। शिया जामा मसजिद के प्रवक्ता सै. फरमान हैदर ने बताया कि शिया वर्ग अब यौमुन्नबी वीक मनायेगा, घरों व इमामबाड़ों में महफिलें होंगी।

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