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मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

रोजेंदारों को जगाने तब आती थी टोलियां



सहरी का वक्त हो गया है, उठो रोज़ेदारो कुछ खां...। कुछ ऐसे ही अल्फाज अल सहर जब गली महल्लो में गूंजते तो तमाम रोजेदार बिस्तर से सहरी करने के लिए उठ बैठते थे। तीन दशक पहले बाकायदा रोजेदारों को जगाने के लिए हर मुहल्लो में टोलियां निकलती थी, आधुनिकता के चलते अब न तो टोलियां रहीं और न ही रमजान में जगाने वाली पुरानी तकनीक। एक समय रमजान शुरू होते ही देर रात घड़ी की सुईयां जब 3 बजे के करीब पहुंचती तो अचानक बनारस समेत पूर्वांचल के तमाम शहरों का नज़ारा बदलने लगता था। रोजादारों को जगाने के लिए टोलियां निकलती। यही नहीं, मस्जिदों से भी रोजेदारों को जगाने के लिए ऐलान होता, माइकों से आवाज आती है, जनाब! नींद से बेदार हो जाइए, सहरी का वक्त हो चुका है। एक रिपोर्ट...

सरफराज अहमद

वाराणसी ०५ अप्रैल (दिल इंडिया लाइव)। सहरी का वक्त हो गया है, उठो रोज़ेदारो कुछ खां...। कुछ ऐसे ही अल्फाज अल सहर जब गली महल्लो में गूंजते तो तमाम रोजेदार बिस्तर से सहरी करने के लिए उठ बैठते थे। तीन दशक पहले बाकायदा रोजेदारों को जगाने के लिए हर मुहल्लो में टोलियां निकलती थी, आधुनिकता के चलते अब न तो टोलियां रहीं और न ही रमजान में जगाने वाली पुरानी तकनीक। एक समय रमजान शुरू होते ही देर रात घड़ी की सुईयां जब 3 बजे के करीब पहुंचती तो अचानक बनारस समेत पूर्वांचल के तमाम शहरों का नज़ारा बदलने लगता था। रोजादारों को जगाने के लिए टोलियां निकलती। यही नहीं, मस्जिदों से भीरोजेदारों को जगाने के लिए ऐलान होता, माइकों से आवाज आती है, नींद से बेदार हो जाइए, सहरी का वक्त हो चुका है। यही नहीं, कहीं-कहीं ढोल व नगाड़े भी बजाए जाते हैं और फिर आवाज लगाकर हर रोजे़दार को उठाने की कोशिश की जाती है रोजेदारों, सहरी का वक्त हो गया है, सेहरी खा लो, हजरात! सिर्फ आधे घंटे बचे हैं जल्दी सेहरी से फारिग हो जाएं। मसिजदों से रोजेदारों को जगाने की यह तकनीक तो आज भी कायम है मगर, रोजेदारों को जगाने वाली टोलिया अब बीते दिनों की बात हो गई। आज, आधुनिकता और तकनीक के इस दौर में सहरी में जगाने के तरीके यकीनन बदल गए हैं। आज सेलफोन, लैपटाप, आइपाट से जहां अजान की आवाजें आ रही है, वहीं इन्हीं तकनीक और साधन से सहरी में जागाने का सहारा ले रहे हैं। 

जी हां! पहले रमजान की सहरी में लोगों को जगाने के तरीके पहले जुदा थे, पूर्वांचल के ज्यादातर इलाकों में लोगों को जगाने के लिए सड़कों पर काफिले निकलते थे। लोगों की टोलियां गलियों व मुहल्लों में घूम-घूम कर रोजेदारों को मीठे-मीठे नगमों से बेदार करती हैं। लोगों को जगाने के लिए कव्वाली गाये जाते थे हम्द व नआते-शरीफ पढ़ी जाती थी और जब बात इससे  नहीं बनती तो ऐलान किया जाता है कि ह्यसहरी का वक्त है रोजेदारों, सहरी के लिए जाग जाओ। वाराणसी के गौरीगंज के मरहूम सैयद नवाब अली को लोग आज भी भूल नहीं पाये हैं। सैयद नवाब अली न सिर्फ रमजान बल्कि हमेशा फजर की नमाज के लिए लोगों को जगाया करते थे।

 बजरडीहा के शकील अहमद बताते हैं कि रमजान में लोगों को जगाने वाली टोलियों जैसी बेहतरीन परंपरा के गायब होने के पीछे आधुनिक तकनीक जिम्मेदार है। पहले जब समय जानने का कोई तरीका नहीं था, तब सहरी के लिए जगाने वाली काफिले की काफी अहमियत थी। लोगों को सोते से जगाने का यह एक अच्छा तरीका था, लेकिन अब लाउडस्पीकर से ही मसजिद से जगाने भर से काम चल जाता है।


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