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सोमवार, 21 अगस्त 2023

India की आजादी ही नहीं, गणतंत्र दिवस पर भी गूंजी थी उस्ताद की शहनाई

शहनाई से उस्ताद नहीं, उस्ताद से जानी जाती हैं 'शहनाई'

‘भारत रत्न’ बिस्मिल्लाह खान की बरसी पर दिल इंडिया लाइव की श्रद्धांजलि 


Varanasi (dil India live)। 21.08.2024. India अपनी बहुलतावादी, मिली-जुली संस्कृति के लिए जगविख्यात है। इसकी वजह यह है कि हिंदुस्तान की सरज़मी पर तमाम ऐसी हस्तियो ने जन्म लिया, जिस पर समूची दुनिया नाज़ करती है। इस फेहरिस्त में शहनाईवादक ‘भारत रत्न’ उस्ताद बिस्मिल्लाह खान भी शामिल हैं। शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जैसी शख्सियतों ने ही इस देश कि मिली-जुली संस्कृति की दुनिया में शिनाख्त कराई। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने अपनी सारी उम्र संगीत को ही अपना सब कुुुुछ माना, वो ताउम्र धर्मवाद, जात-पात का विरोध करते रहे और संगीत के ही रियाज में लगे रहे। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को नाज़ था कि वो बनारस में रहते है जहां गंगा बहती है, आज उस्ताद को दुनिया से गये अर्सा हो गया मगर वो आज भी देश-दुनिया में वैसे ही जाने जाते है जैसे पहले जाने जाते थे।, यह कहा जाये कि शहनाई से उस्ताद नहीं, उस्ताद से शहनाई जानी जाती है, तो गलत नहीं होगा। बिस्मिल्लाह खान वो शख्सियत हैं जिन्होंने देश की आजादी का स्वागत लाल किले पर शहनाई से तो किया ही साथ ही गणतंत्र दिवस पर भी उस्ताद की शहनाई की गूंज दुनिया के कोने कोने तक पहुंची थी।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाज़े गए उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है, क्योंकि मुल्क का बच्चा-बच्चा उनके नाम, शोहरत और उनकी आजीवन संगीत साधना से परिचित है। संगीत के क्षेत्र में उनकी साधना के कायलों की तादाद हिन्दुस्तान ही नही विश्व भर मेें है। जिसका संगीत से कोई सरोकार नही है। वो भी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान कि शहनाई की तान सुन झूम उठता था। वो खुशी के साज पर गम का तराना बजाते थे, बिस्मिल्लाह खां जब मोहर्रम में अपनी शहनाई से आंसुओ का नज़राना पेश करते थे तो सभी कि आंखो में आंसु आ जाता था। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान बिहार में मुस्लिम परिवार में पैैैैदा हुए। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान बहुत छोटी उम्र में ही अपने पिता पैगम्बर बख्श खान के साथ बनारस आकर बस गए थे, जहां उन्होंने अपने मामा अली बख्श ‘विलायत’ से शहनाई बजाना सीखा, जो काशी के बाबा विश्वनाथ मन्दिर में स्थायी रूप से शहनाई-वादन किया करते थे। अपने मामा के इंतकाल के बाद उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने भी बरसों बाबा विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाई।

पीएम नेहरू के कहने पर बजाई थी शहनाई

15 अगस्त 1947 में जब देश आजाद हुआ तो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के लाल किला पर तिरंगा फहराने के बाद उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने देशवासियों को बधाई देने के लिए लाल किले से शहनाई बजाई। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने पीएम जवाहर लाल नेहरू के कहने पर शहनाई बजाई थी। 1997 में आजादी की 50 वीं वर्षगांठ पर भारत सरकार के आमंत्रण पर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने दूसरी बार लाल किले के दीवाने-आम से शहनाई बजाई। यह भी एक मिसाल है कि 1992 में ईरान के तेहरान में एक बड़ा ऑडिटोरियम बनाया गया, जिसका नाम उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के नाम पर रखा गया, ‘तालार मौसीकी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान’ उन्होंने कन्नड़ फिल्म में साउथ के सुपरस्टार राजकुमार की फिल्म ‘शादी अपन्ना’ के लिए शहनाई बजाई थी। यह फिल्म ब्लॉकबस्टर थी। ऐसे ही उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने सत्यजीत रे की फिल्म ‘जलसाघर’ में नजर आए थे और 1959 की फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ में भी उस्ताद ने ही शहनाई बजाई व ‘रॉकस्टार’ फिल्म में भी उनकी शहनाई बजी थी। भारत के पहले गणतंत्र दिवस (26 जनवरी, 1950) पर उन्होंने लाल किले से राग कैफी की प्रस्तुति दी थी। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का बचपन का नाम कमरूद्दीन था लेकिन वो बिस्मिल्लाह खान के नाम से मशहूर हुुुए। 

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