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ब्रेकिंग न्यूज

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बुधवार, 3 दिसंबर 2025

Mushayra : तामीर फाउंडेशन की अगुवाई में हुआ महफ़िल-ए-मुशायरा

वो मुझसे हारने के बाद अक्सर, मेरी परछाईं का सर काटता है...



dil india live (Chandoli). मुगलसराय (Mughalsarai) स्थित होटल स्प्रिंग स्काई में, तामीर फाउंडेशन की अगुवाई में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के शिक्षा दर्शन एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अवसर पर महफ़िल-ए-मुशायरा का आयोजन किया गया। मुशायरे की सदारत उपन्यासकार व वरिष्ठ शायर प्रो. याकूब यावर, (पूर्व विभागाध्यक्ष URDU DEPARTMENT, BHU) ने की और संचालन डॉ. अज़हर सईद (डायट लेक्चरर) कर रहे थे। विशिष्ट अतिथि डॉ आयाज़ आज़मी थे। मुशायरे (काव्य संध्या) में बनारस, चंदौली, मिर्ज़ापुर, आज़मगढ़, इलाहाबाद सहित अन्य क्षेत्रों से कई प्रमुख शायरों और कवियों ने अपने कलाम और कविता से लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। इस दौरान शायरों के उम्दा कलाम का कद्रदान ने पूरे मुशायरे में लुत्फ उठाया। इस मौके पर याकूब यावर ने सुनाया


 

“हमारा सच और आपका सच कुछ और है, हम यह जानते हैं, हमारा सच जान जाइएगा तो जान से अपनी जाइएगा।

ज़बा वाला यहां कम बोलता है, मगर गूंगा दमा‑दम बोलता है।” लोगों को खूब पसंद आया। मशहूर शायर आयाज़ आज़मी की शायरी भी लोगों ने पसंद की।

“प्रीत की पीड़ा क्या बतलाएं, अपना‑अपना अनुभव है,

मीरा तड़पे श्याम अगन में, राधा नाचे मधुबन में।”

अब नंबर था आलम बनारसी का, उन्होंने पढ़ा...

बेक़रारी सी बेक़रारी है, तुम चले आओ तो क़रार आए। 

लोगों से वाहवाही लूटने में कामयाब रहें।




शायरा नसीमा निशा ने लोगों को कुछ इस अंदाज में नसीहत दी,... “गिर न जाओ ज़मीन पर थक कर, इतना ऊंचा उड़ा नहीं जाता।” वहीं शाद मशरूकी ने अपने अंदाज में महफिल में किरदार पर सवाल खड़ा कर दिया, ...जैसा है जो वैसा है नज़र क्यों नहीं आता, किरदार का चेहरों पे असर क्यों नहीं आता।, लोग गुनगुनाते रहें। जहां दानिश ज़ैदी ने सुनाया... हम कहीं कैद रह नहीं सकते, हम परिंदों का घर नहीं होता। तो वहीं दूसरी ओर डा. बख़्तियार नवाज़ ने अपनी शायरी से अलग एहसास कराया, उन्होंने पढ़ा, वो मुझसे हारने के बाद अक्सर, मेरी  परछाईं का सर काटता है...।




ऐसे ही फूलपुर से तशरीफ़ लाए शारीक़ फूलपूरी ने कलाम सुनाया, गुलशन में न आना अभी कुछ रोज़ परिंदों, इस वक़्त भरोसे का निगहबान नहीं है...। लोगों को खूब पसंद आया। वहीं रामनगर से आए, युवा दिलों की धड़कन ज़मज़म रामनगरी ने अशरार पेश किया, वो बन संवर के सरे आम ऐसे बैठा है, के उसके सामने माह ए तमाम कुछ भी नहीं...।

वहीं सुरेश अकेला ने उर्दू ज़बान की तारीफ कुछ इस अंदाज में की, उसके बगैर गीत न गजलें कहा कभी, सच पूछिए तो शायरी की जान है उर्दू...। महफ़िल लूटने में कामयाब रहे।ज़िया अहसनी ने पढ़ा, अच्छी ही बात क्यों ना हो लाज़िम है एहतियात, बढ़ जाए रोशनी भी तो ज़ूल्मत से काम नहीं...। व नदीम गाजीपुरी ने सुनाया, मिसाल देगा ज़माना तेरी बगावत का, ये रस्म फैली हुई आज कायनात में है...। पसंद की गई। जहां अब्दुल रहमान नूरी ने माहौल को थोड़ा बदला, सुनाया ...वो एक पल में निगाहों में क़त्ल करता है, अब उसकी आंख ही खंजर है क्या किया जाए।




उधर अबू शहमा ने इल्म और तालीम की जरूरत पर जोर कुछ इस अंदाज में दिया, हो ताज भी मसनद भी हाकिम भी हो क्या मतलब, सिस्टम के चलने को तालीम जरूरी है...। तो अनिल प्रवक्ता ने महफ़िल को नया रंग दिया, तुम्हें देखकर बीनाई खोई मैंने, कोई तुमसे भी प्यारा कैसे हो सकता है...। लोगों को खूब पसंद आया। ऐसे ही आकाश मिश्रा ने आज के हालात बयां किए, जो तुम्हारे सहारे बैठे हैं, कभी उनका भी एक जमाना था..। मुशायरे में क़सीमुद्दीन मखदूमाबादी अपनी शायरी में सिस्टम के खिलाफ आंदोलन करते नजर आए, अमिर ए वक्त से कह दो कि आए मेरी महफ़िल में, क़सीदा मुझको भी दरबार में पढ़ना नहीं आता...।

शफाअत अली ने पढ़ा, मुझे मत ले चलो तुम अपनी महफिल में, मेरे हिस्से में तनहाइयां हैं...। तो, ज़हिद अल्फ़ाज़ ने पढ़ा, मेरी नजरों में बसी थी मेरे घर की गुरबत, पांव का इसलिए देखा नहीं छाला मैंने...। लोगों ने खूब सराहा।

 मुशायरा के आखिर में अफसर रूमानी ने सभी मेहमानों का धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर डॉ. शमशीर अली, डॉ तमन्ना शाहीन, इरफान अली मंसूरी, इरफान, इमरान, मो अय्यूब, मतीन, शमसुद्दीन, शमीम रियाज़, सुल्तान क्लब के अध्यक्ष डा. एहतेशमुल हक आदि लोग उपस्थित थे।







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